झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध पर्व सरहुल कब और क्यों मनाया जाता है

चुकी यह आदिवासियों का सबसे प्रमुख पर्व है इसलिए इसे झारखण्ड के अलावे और भी कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जैसे मध्य प्रदेश, ओडिशा,  पश्चिम बंगाल, में भी मनाया जाता है. चलिए जानते है, की झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध पर्व सरहुल (Sarhul Festival 2022) क्यों ख़ास है, और यह कब और क्यों मनाया जाता है. happy sarhul puja 2022, happy sarhul 2022 images, happy sarhul wishes, सरहुल पर्व फोटो, sarhul status

झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध पर्व सरहुल कब और क्यों मनाया जाता है

जहाँ एक तरफ झारखण्ड अपने गर्व में विभिन्न प्रकार के खनिजो और सम्पदाओ को बटोरे हुए है, वही दूसरी तरफ़ अपने कला और संस्कृति के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है. झारखण्ड में कई ऐसे पर्व और त्यौहार है, जो यहाँ के लोगो का ही नहीं बल्कि इस राज्य के बाहर बसे लोगो का भी मन मोह लेती है, ऐसे ही एक त्यौहार जो चैत माह में मनाया जाता है, जिसे झारखण्ड-वासी सरहुल पर्व के नाम से जानते है. चुकी यह आदिवासियों का सबसे प्रमुख पर्व है इसलिए इसे झारखण्ड के अलावे और भी कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जैसे मध्य प्रदेश, ओडिशा,  पश्चिम बंगाल, में भी मनाया जाता है. चलिए जानते है, की झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध पर्व सरहुल (Sarhul Festival 2022) क्यों ख़ास है, और यह कब और क्यों मनाया जाता है.

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पर्व सरहुल कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है

सरहुल का अर्थ है “सर” यांनी “सरई” सखुआ के फूल तथा हुल का अर्थ है “बदलाव” इसलिए, झारखण्ड के आदिवासियों के द्वारा इसे प्रकृति पर्व कहा जाता है, क्योकि आदिवासियों का मानना है, की प्रकृति उनके भगवान के समान है, जब वसंत ऋतू की शुरुआत होती है, तब पेड़ पौधे अपने आप को नए पत्तों और फूलो से सजा लेते है, और इसके बाद पूरी प्रकृति हरियाली और फूलो की खुशबु से भर जाती है. और प्रकृति के इस नए आगमन के स्वागत के लिए लोग उत्साह से सरहुल पर्व को मानते है.

सरहुल पर्व चार दिन तक मनाया जाता है, यह चैत्र शुक्ल पक्ष के तृतीया से शुरू होता है और चैत्र पूर्णिमा के बाद समाप्त हो जाता है. इसे नए वर्ष का प्रतिक भी माना जाता है. सरहुल (sarhul puja) की शुरुआत मछली के जल को घर के सभी कोनो में छिड़का जाता है लोग ऐसा करने को समृधि का प्रतिक मानते है. दुसरे दिन गांव का पाहन का उपवास होता है, और इस उपवास के दौरान पहन यानि पुजारी गाँव के घर के छत तथा द्वार पर सरई का फूल लगाता है. तीसरे दिन सरना स्थल पर सरई के फूलों की पूजा पाहन यांनी गांव का पुजारी के द्वारा की जाती है, सरना स्थल पर स्त्री-पुरुष दोनों ही पारंपरिक ढोल नगाड़ा और मंजीरे लेकर रातभर नाचते-गाते हैं। और सरहुल का अंतिम यांनी चौथे दिन गिड़ीवा नमक स्थान पर सरहुल फूल (सखुआ के फूल) का विसर्जन कर दिया जाता है।

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सरहुल का नृत्य और पोशाक क्या होता है

सरहुल पर्व के लिए एक कहावत बहुत ही प्रसिद्ध है, “नाची से बाँची”. इसे मनाने वाले लोग एक विशेष प्रकार के नृत्य और पोशाक का इस्तेमाल करते है. सरहुल के समय नृत्य अखाड़ो में किया जाता है, इस कर्म में महिलाये सफेद में लाल पड़ी वाली साड़ी पहनती है और जुड़े में सरई का फूल लगाती है. इनकी साडी में सफ़ेद पवित्रता और शालीनता तथा लाल रंग संघर्ष को दर्शाता है. इसलिए सरना झंडा भी सफ़ेद और लाल रंग की पत्तियों का बना होता है.

सरहुल पर्व और महाभारत से जुड़ी प्राचीन कथा

यह बात महाभारत के समय की है, जब पांडव और कौरव में युद्ध हो रहा था तब कई मुंडा आदिवासियों ने भी इस युद्ध में भाग लिया और कौरवों के तरफ से लड़ते हुए कई मुंडा सरदार मारे गए. मुंडा के इस मृत शारीर की पहचान करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के वृक्षों के पत्तों और शाखाओं से ढक दिया गया. जब बाद में देखा गया तो, यह पता चला की, जो शव साल वृक्षों के पत्तों और शाखाओं से ढका गया था, वो विल्कुल सुरक्षित थे, लेकिन अन्य शव सड़ गए थे, जब मुंडाओ ने यह सब देखा तो आदिवासियों को प्राकृतिक के इस अद्भुत चमत्कार पर विश्वास बढ़ गया, और वे उसी समय से साल के वृक्ष की पूजा करने लगे और इसके लिए सरहुल पर्व को मनाने की प्रथा भी चलने लगी.

इस कहानी के पीछे कई मिथक कथा मानते है तो कई लोग इस पर विश्वाश करते है, जो भी हो, लेकिन आज मानुष प्रकति के बिना जिन्दा नहीं रह सकता है. आदिवासियों का जंगल से लगाव काफी पुराना है और से प्रकृति के काफी नजदीक भी रहते है, इसलिए वो भली- भाति जानते है, की धरती पर उगे पेड़ -पौधे के बिना जीवन संभव नहीं है. इसलिए वो इस पर्व को मनाकर लोगो को प्रकृति से प्रेम करने का सन्देश देते है.