खोखली जमीन पर बसा है गांव! घरों के नीचे से जमीन गायब, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

निरसा प्रखंड मारकोडा का एक गांव जो आज दहशत में जीने को मजबूर है. इस गांव में लगभग 300 मकान है और उसमें बसने वाली आबादी की संख्या एक हज़ार के आस पास है जो आज हर पल दहशत में है. वजह है कोल इंडिया की इकाई ईस्टर्न कोलफील्ड मुगमा एरिया के शामपुर बी कोलियरी मैनेजमेंट की लापरवाही.

खोखली जमीन पर बसा है गांव! घरों के नीचे से जमीन गायब, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

Dhanbad News: निरसा प्रखंड मारकोडा का एक गांव जो आज दहशत में जीने को मजबूर है. इस गांव में लगभग 300 मकान है और उसमें बसने वाली आबादी की संख्या एक हज़ार के आस पास है जो आज हर पल दहशत में है. वजह है कोल इंडिया की इकाई ईस्टर्न कोलफील्ड मुगमा एरिया के शामपुर बी कोलियरी मैनेजमेंट की लापरवाही.  लापरवाही ऐसी की गांव की पूरी आबादी को काल के गाल में सामने का डर सता रहा है. इस मामले को लेकर  ग्रामीण दशकों से आंदोलनरत है लेकिन सिवाय मायूसी के आज तक कुछ हाथ नहीं आया है.

जानें क्या है पूरा मामला
ये आंदोलन 1988 में शुरू हुआ था जब वहां पर कोलियरी चला कर कोयला निकलने का काम किया जा रहा था.  मारकोडा गांव के ग्रामीण तब से विरोध कर रहे हैं. उस समय ग्रामीणों ने तत्कालीन बिहार सरकार से लेकर भारत सरकार के कोयला मंत्रालय को इसकी शिकायत  किया था लेकिन उनके विरोध और मांग का कोई हल नहीं निकला. ग्रामीण पत्रों में माध्यम से लगातार विरोध दर्ज करते रहे लेकिन 35 साल बीत जाने  बाद भी कोई उचित न्याय ग्रामीणों को नहीं मिल पाया. हालांकि कई बार ECL के तरफ से कहा गया की ग्रामीणों पुनर्वास कराया जायेगा लेकिन ये बात मात्र एक आश्वासन बन कर रह गया. एक बार फिर ग्रामीण आर पार की लड़ाई के मूड में है.

105 फीट के नीचे नहीं है जमीन
मामला फिर से जब जोर पकड़ने लगा जब एक ग्रामीण ने पेयजल की समस्या से निजात पाने के लिए अपने घर के आंगन में बोरिंग करवाया, दरअसल जब बोरिंग किया जा रहा था तब 105 फ़ीट बोर करने पर नीचे खदान मिल जाने के कारण जमीन खाली पाया गया और बोर करनेवाले ने कहा की निचे जमीन ही नहीं है तो पानी कहां से आएगा. ग्रामीणों ने बताया की प्रबंधन बस्ती के निचे से कोयला निकाल चुकी है और वो भी महज 100 फ़ीट निचे से जमीन को खोखला कर दिया गया है. 

जब बोरिंग ऑपरेटर ने बोरिंग का काम बंद कर दिया और खदान होने के बात कहकर काम करने से इंकार कर दिया तब इसकी जानकारी ग्रामीणों को हुयी, अब ग्रामीणों को ये भय सताने लगा है की गांव के नीचे खदान है और जमीन खोखली है इससे ये गांव कभी भी जमींदोज हो सकता है तब से ग्रामीणों के रात की नींद उड़ गयी है. साथ ही गांव से महज 600 मीटर की दुरी पर खदान चलाया जा रहा है जहां पर हैवी ब्लास्टिंग किया जा रहा है जिसके कारण घरो में दरार पड़ रहा है. वही हैवी ब्लास्टिंग से पूरा गांव थर्रा जाता है, ऐसे में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. इस सब बातो से प्रबंधन को अवगत कराया जा चूका है लेकिन प्रबंधन कुम्भकर्णी नींद में सोई हुयी है और हादसे का इंतज़ार कर रही है, अब ग्रामीण गोलबंद हो चुके हैं और जेएमएम नेता अशोक मंडल के नेतृत्व में चरणबद्ध आंदोजन करने की तयारी में है.

कैसे बचेगी इनकी जान
अब सवाल ये उठता है की जब भूमिगत खदान जमीन के 300 फ़ीट निचे चलाने का नियम है, तो 100 फ़ीट निचे किसकी लापरवाही से चलाया गया और अगर ये गांव में किसी तरह की भू धसान और जमींदोज जैसी घटना हुयी तो इसका जिम्मेवार कौन होगा. बहरहाल अब देखना ये है की ग्रामीण की समस्या का हल कब तक होगा या उनलोगो को उनके हाल पर मरने छोड़ दिया जायेगा.