रांची का मनोकामना वृक्ष कल्पतरू को किसने लगाया, कैसे हुई इस पेड़ की पहचान, जानें सबकुछ..

झारखंड की राजधानी रांची के डोरंडा इलाके में मुख्य सड़क पर हैं मुरादों वाले पेड़. इन पेड़ों के पास से गुजरते ही आपका ध्यान उस पेड़ पर जरूर चला ही जाएगा. पेड़ की मोटी जड़, बड़े तने और दो-चार लोगों की भीड़.

रांची का मनोकामना वृक्ष कल्पतरू को किसने लगाया, कैसे हुई इस पेड़ की पहचान, जानें सबकुछ..

Jhakash News 

Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची के डोरंडा इलाके में मुख्य सड़क पर हैं मुरादों वाले पेड़. इन पेड़ों के पास से गुजरते ही आपका ध्यान उस पेड़ पर जरूर चला ही जाएगा. पेड़ की मोटी जड़, बड़े तने और दो-चार लोगों की भीड़. कोई सर झुकाएं, तो कोई पेड़ को छूकर अपनी मुरादें पूरी करने के लिए बुदबुदाता नजर आ ही जाता है, यही नहीं वहां से गुजरने वाला हर शक्स कुछ न कुछ अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करता है. ये तीन पेड़ डोरंडा कॉलेज के पास हैं, जिन्हें कल्पतरु कहा जाता है.

मनोकामना पूरी होती है

हिन्दुओं की पौराणिक कथाओं के अुनसार कल्पतरु को ईश्वरीय वृक्ष का दर्जा दिया गया है. वेदों के अनुसार कल्पतरु की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी. मान्यता के आधार पर शहरवासी इस पवित्र वृक्ष से मनोकामना मांगते हैं. शहर के बाहर से भी आए लोग इस पेड़ को देखने के लिए जरुर आते हैं. और पूरा होने पर मनोवांछित फल मिलने पर आभार जताना नहीं भूलते.

दुर्लभ पेड़ है कल्पतरु

इस पेड़ को सरकार ने दुर्लभ पेड़ की श्रेणी में रखा है. पर्यावरणविद् नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार देश भर में सिर्फ नौ ही कल्पतरु पेड़ हैं, जिनमें चार रांची में थे, लेकिन कुछ साल पहले ही एक पेड़ भारी बारिश के कारण गिर गया. लाख कोशिशों के बावजूद भी उसे जिंदा नहीं किया जा सका.

अंग्रेजों ने लगाए थे पेड़ 

जनकारी के अनुसार ढाई सौ साल पहले इस कल्पतरु पेड़ को अंग्रेज रांची लेकर आए थे. उस समय इसके बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते थे, लेकिन एक स्थानीय मुस्लिम ने इसके महत्व और अनोखेपन के बारे में जब लिखा, तो धीरे-धीरे दुनिया इनके बारे में जानने लगी.