कैसे बनी थी पहली भोजपुरी फिल्म, जाने पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण की दिलचस्प कहानी

पहली भोजपुरी फिल्म 1963 में रिलीज विश्वनाथ शाहाबादी की ''गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' थी। 1961 में पहली बार दिलीप कुमार की गंगा-जमुना फिल्म में अवधी-भोजपुरी भाषा के डायलॉग का इस्तेमाल हुआ |

कैसे बनी थी पहली भोजपुरी फिल्म, जाने पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण की दिलचस्प कहानी

ग्रामीण और मेहनकश लोगों की संस्कृति और भाषा के प्रतीक के रूप में भारतीय फिल्मों में मौजूद रही भोजपुरी हिंदी फिल्मों में कभी एक छोटे कैरेक्टर आर्टिस्ट तो कभी गानों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराती रही | सत्य हरिश्चंद्र,सती अनुसूइया, श्री 420, तीसरी मंज़िल जैसी दमदार यादगार फिल्मों में आम आदमी भोजपुरी भाषी ही हुआ करता था |

पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण की दिलचस्प कहानी
पहली भोजपुरी फिल्म 1963 में रिलीज विश्वनाथ शाहाबादी की ''गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' थी जिसने तत्कालीन सरल जीवन शैली वाले पारंपरिक भारतीय परिवार की कहानी से भोजपुरी भाषी ही नहीं अन्य लोगों के दिलों  छू लिया था | माया नगरी मुंबई में भोजपुरी फिल्में तो नहीं बनती थीं, लेकिन भोजपुरी इलाकों के कई लेखक, गीतकार और संगीतकार वहां मौजूद थे | उन्हें मालूम था कि गांव की सरलता और भोलेपन को दिखाने के साथ अर्द्धशहरी भारत के दर्शकों के दिलों में जगह बनाने के लिए भोजपुरी भाषा ज़रूरी थी | 

1961 में पहली बार दिलीप कुमार की गंगा-जमुना फिल्म में अवधी-भोजपुरी भाषा के डायलॉग का इस्तेमाल हुआ | डायलॉग और गाने हिट हुए तो उत्तर भारतीय राज्यों की बोलियों की अहमियत लोगों को समझ आने लगी | ऐसे में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से एक बिहार के कारोबारी विश्वनाथ शाहाबादी भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए उत्सुक हुए और बम्बई पहुंचे,जहां उनकी मुलाकात नजीर हुसैन से हुई जो सालों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाने की सोच रहे थे | इस तरह जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के सक्रिय सहयोग से  'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' के निर्माण की योजना बनी. फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बनारस के ही रहने वाले असीम को फिल्म में हीरो और कुमकुम को हीरोईन बनाया गया |

इस फिल्म की सफलता के बाद भोजपुरी फिल्मों की लाइन लग गई अगली पांच साल में 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई | लेकिन बिना अनुभव, तकनीकी ज्ञान और अच्छे कलाकारों की कमी के कारण अनेक फिल्मों ने डिब्बे में दम तोड़ दिया | कॉमर्शियली 2004-05 में पुरानी गलतियों से सीख लेकर कुछ नए कुछ पुराने लोग आगे आये और अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की |

साल 2004 में रिलीज मनोज तिवारी की फिल्म 'ससुरा बड़ा पईसा वाला' ब्लॉकबस्टर साबित हुई | फ़िल्मी पंडितों के अनुसार 15 लाख में बनी इस कॉमर्शियल फिल्म ने लगभग 15 करोड़ की कमाई की | ससुरा बड़ा पईसा वाला और साल 2005 में आई फिल्म 'पंडितजी बताइ ना बियाह कब होई'  फिल्मों से भोजपुरी फिल्म प्रोड्यूसर्स का कॉन्फिडेंस बढ़ा | इसके बाद मनोज तिवारी की ही फिल्म 'दरोगा बाबू आई लव यू' ने चार करोड़ और 'बंधन टूटे ना' के 3 करोड़ के कारोबार करने का अनुमान लगाया गया और मुंबई फिल्म उद्योग के अलावा टी सीरीज जैसी म्यूज़िक कंपनियों ने अपने दरवाज़े खोल दिए |

उसके बाद निरहुआ ने फिल्मों में कदम रखा | उनकी पहली फिल्म 'निरहुआ रिक्शा वाला' जबरदस्त हिट हुई | यह फिल्म बिहार और यूपी के सिनेमाघरों में दो महीने से ज्यादा समय तक टिकी रही | अब तो निरहुआ यानी दिनेश लाल यादव एक भोजपुरी फिल्म गायक, अभिनेता और टेलीविजन प्रस्तोता के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं |
बिग बॉस शो के कंटेस्टेंट रहे, दिनेश लाल यादव को उत्तर प्रदेश सरकार का सर्वोच्च सम्मान यश भारती से सम्मानित किया जा चुका है | प्रख्यात बिरहा गायक विजय लाल यादव दिनेश लाल यादव के बड़े भाई हैं | उनकी हिट फिल्मों में काशी अमरनाथ ‘घूंघट में घोटाला’, ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’, ‘पटना से पाकिस्तान,  ‘निरहुआ चलल लंदन प्रमुख हैं |

वर्तमान और भविष्य 
मुंबई की हिंदी फिल्मों की तरह फ़ॉर्मूला मसाला फ़िल्मों और कमज़ोर,बासी पटकथा के साथ अश्लीलता ने भोजपुरी फिल्मों को वो मुकाम नहीं दिया है, जिसकी वह असल हक़दार है | क्षेत्रीय खास तौर पर मराठी, बांग्ला और दक्षिण की  फिल्मों की विकास गति की तरह भोजपुरी ने तकनीक, नए प्रयोग और दिलों को छूनेवाली कहानियों बजाय अश्लीलता और फूहड़ता का दामन थामा, जिससे पढ़ा-लिखा वर्ग या आधुनिक युवा दर्शक सिनेमा से कट गए | कहां कहे के तो सभे केहू आपन आपन कहावे वाला के बा(महेंद्र कपूर,आशा भोंसले -फिल्म गंगा किनारे मोरा गांव ) और कहां आजकल के गाने | 

दरअसल संवेदनशील भोजपुरी फ़िल्में और गीत ही इस इंडस्ट्री को उन ऊँचाईयों तक ले जा सकती है जहाँ पब्लिक स्कूलों  के पढ़े बच्चे से लेकर परिवार के सभी सदस्य इसे अपनी माटी की आवाज़ समझें | बाहुबली, रोबोट, पाथेर पांचाली और दर्ज़नों ऐसी फ़िल्में इशारा कर रहीं हैं कि हॉलीवुड की तरह की फ़िल्में चाहिए और भोजपुरी में भी क्यों नहीं ? शायद एक दिन ऐसा आये जब भोजपुरी की फ़िल्में भी तेलगू,तमिल और बांग्ला की तरह हिंदी में दब होकर भोजपुरीया समाज को गौरान्वित करे |